# परी है होड़ नंद अरु माय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0300-M07-K032
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 32
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 139–139

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>परी है होड़ नंद अरु माय।  
<a id="line-2"></a>दोउन कहत प्यार मोहन को, मोही ते बहुताय।  
<a id="line-3"></a>निर्णय हेतु नंद अरु यशुमति, दोउ मोहन ढिग आय।  
<a id="line-4"></a>दोउ वात्सल्य प्रेम-रस संयुत, दिय निज भुज फैलाय।  
<a id="line-5"></a>मोहन नित की भांति यशोमति, गोदिहिं बैठ्यो जाय।  
<a id="line-6"></a>गयेउ नंद खिसियाय हार लखि, रहेउ नैन जल छाय।  
<a id="line-7"></a>परम कौतुकी श्याम नंद के, उर महँ प्रकट्यो जाय।  
<a id="line-8"></a>प्रकटत नँदनंदन नँद को निज, गोदिहिं पर्यो लखाय।  
<a id="line-9"></a>अंतर्धान भये उत यशुमति, गोदिहिं तजि मुसकाय।  
<a id="line-10"></a>कह “कृपालु” सुनु मातु यशोमति, याय न कोउ पतियाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

आज बाबा नंद एवं मैया यशोदा में प्रेम की होड़ लगी हुई है। दोनों कहते हैं कि श्यामसुन्दर मुझसे ही सबसे अधिक प्यार करते हैं। इसके निर्णय के लिए नन्द एवं मैया यशोदा दोनों श्यामसुन्दर के पास आये। दोनों ने यह प्रथम ही निश्चय कर लिया था कि श्यामसुन्दर से बिना कुछ कहे ही अपने हाथों को फैला दिया जाय। तदनुसार दोनों ने अपने रोम-रोम में वात्सल्य प्रेम भर कर अपनी-अपनी विजय की आकांक्षा से अपनी अपनी भुजाओं को फैला दिया। बालकृष्ण बाल लीला का अभिनय करते हुए नित्य की भाँति मैया यशोदा की गोदी में जाकर बैठ गये। नन्द ने अपनी हार मान ली एवं खिसिया गये। उनकी आँखों में पानी भर आया। सर्वान्तर्यामी श्यामसुन्दर नन्द के हृदयस्थ भावों को पहिचान कर योगमाया की शक्ति से उनके हृदय में प्रकट हो गये। जिसके परिणाम स्वरूप नन्द को ऐसा अनुभव हुआ कि श्यामसुन्दर मेरी ही गोद में बैठे हैं। उधर पशोदा के हृदय में, जीत जाने के कारण, अहंकार का अंकुर पैदा ही गया, जिसको मिटाने के लिए श्यामसुन्दर मुस्करा के उनकी वोद से अलक्षित हो गये। इस प्रकार दोनों की हार एवं दोनों की ही जीत सिद्ध हो गयी। इसी बीच 'कृपालु' ने जाकर मैया गशोदा के कान में चुपके से कहा कि इस छलिया को कोई भी भपना न समझे अर्थात् अपना समझने का मिथ्याहंकार न करे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 295-296

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
