# पियत थन सुरभिन नंदकुमार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0303-M07-K035
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 35
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 140–141

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>पियत थन सुरभिन नंदकुमार।  
<a id="line-2"></a>इक थन पियत सुरभि-सुत इक थन, यशुमति-सुत बलिहार।  
<a id="line-3"></a>दोउन महँ जनु होड़ परि गई, को जीतत को हार।  
<a id="line-4"></a>अति द्रुत पियत जात पय पुनि पुनि, एकहिं एक निहार।  
<a id="line-5"></a>प्रेम मगन सुरभिन दृग अरु थन, बह पय अरु पयधार।  
<a id="line-6"></a>पुनि पुनि थन छुटि जात मुखन दोउ, पुनि पुनि निज मुख डार।  
<a id="line-7"></a>लखत “कृपालु” नंद यशुमति दुरि, उर आनंद अपार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

छोटे से ठाकुरजी गायों के थन से मुँह लगाकर दूध पीते हैं, तत्सम्बंधी एक झाँकी का वर्णन है-एक गाय के एक थन को ठाकुरजी एवं दूसरे थन को बछड़ा पी रहा है। ऐसा लगता है कि जैसे उन दोनों में हार-जीत की होड़ लग गई है। वे दोनों अति शीघ्रता से अपने-अपने थन का दूध पीते जाते हैं एवं बार-बार ईर्ष्या भरी दृष्टि से एक दूसरे को देखते जाते हैं। बछड़े के प्यार से विभोर होकर गाय के शेष दोनों थनों से अपने-आप दूध बह रहा है एवं श्यामसुन्दर के प्यार से विभोर होकर गाय के दोनों नेत्रों से आनन्द की जलधारा बह रही है। अति शीघ्रता से दूध पीने के कारण दोनों के मुख से बार-बार थन छूट जाता है, किन्तु तत्काल ही पुनः थन मुख में डाल लेते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस मनोहर झाँकी को नन्द बाबा एवं यशोदा मैया छिप कर देख रहे हैं तथा आनन्द-विभोर हो रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 298-299

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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