# कान्ह मम, जागो जीवन प्रान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0305-M07-K037
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 37
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 141–141

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>कान्ह मम, जागो जीवन प्रान।  
<a id="line-2"></a>आयो भानु जगावन तो कहँ, देखु देखु उठु कान्ह।  
<a id="line-3"></a>धनसुख मनसुख श्रीदामादिक, टेरत सुनहु सखान।  
<a id="line-4"></a>जितनोइ मातु जगावति तितनोइ, लेत पीतपट तान।  
<a id="line-5"></a>कह्यो जननि"जनि उठहु नवनि सब, दाउहिं दउँ जिय जान"।  
<a id="line-6"></a>उठे “कृपालु” श्याम झुकि झूमत, चूमति मातु सुजान॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है कि मेरे प्राणप्यारे जागो। देखो, देखो, उठकर देखो तो तुमको सूर्य नारायण जगाने आये हैं। सुनो तो धनसुख, मनसुख श्रीदामादि सखागण तुम्हें पुकार रहे हैं। मैया अनेक प्रकार से जितना ही जगाने का प्रयत्न करती है श्यामसुन्दर उतनी ही पीताम्बर तानकर सो जाते हैं। खीझकर मैया ने कहा अच्छा पत उठ, में जा रही हूँ। अभी सारा मक्खन बलदाऊ भैया को दूँगी, तुम सोते ही रह जाओगे। 'कृपालु' के विचारानुसार मक्खन के लोलुप श्यामसुन्दर यह सुनते ही, झूमते एवं झुकते हुए उठे। मैया ने भी श्यामसुन्दर का आलिंगन, चुम्बन किया।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 300

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
