# भोर भइ जागो नवल किशोर।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0306-M07-K038
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 38
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 142–142

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>भोर भइ जागो नवल किशोर।  
<a id="line-2"></a>श्यामलगातहिं मात जगावति, नहिं जागत बरजोर।  
<a id="line-3"></a>निज कर पकरि बिठावति पुनि पुनि, गिर्यो परत चितचोर।  
<a id="line-4"></a>मूँदि नैन मधु बैन कहत हरि, अबहिं भई कहँ भोर।  
<a id="line-5"></a>मैया कह,"टुक दृगन खोलि लखु"भैया कह झकझोर।  
<a id="line-6"></a>"उठ उठ उठ रे कनुआँ अबहूँ, नींद गई नहिं तोर"।  
<a id="line-7"></a>हरि “कृपालु” तब अरबराइ उठ, यशुमति लेति अँकोर॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

सोते हुए श्यामसुन्दर को जगाती हुई मैया कहती है, 'हे कन्हैया! सबेरा हो गया जागो तो। मैया झकझोर झकझोर कर थक गयी किन्तु फिर भी हठीले श्यामसुन्दर नहीं जागे। तब मैया ने अपने हाथ से पकड़कर बार-बार बैठाया किन्तु फिर भी श्यामसुन्दर गिर पड़ रहे थे। थोड़ी देर बाद आँख बन्द किये हुए ही श्यामसुन्दर ने प्यार भरी तोतली बोली से कहा-''अभी सवेरा कहाँ हुआ है।''इतने में बलदाऊ भैया ने जोरों से झकझोर कर कहा- अरे कनुआँ! उठ, उठ, उठ तेरी नींद अभी भी नहीं गयी, सवेरा हो गया।'''कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर अत्यन्त शीघ्र अड्बड़ाकर उठे एवं मैया की गोद में लिपट गये।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 300-301

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
