श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 11
धन्य सो मातु यशोमति भाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhanya so mātu yashomati bhāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धन्य सो मातु यशोमति भाम।
2श्री कृष्णहिं"कनुवा", कहि टेरत"बलुवा"कहि बलराम।
3"पूर्व जनम रह शूकर"कह लखि, धूरि धूसरित श्याम।
4"पूर्व जनम रह मच्छ"कहत लखि, जल विहार अभिराम।
5मुख माटी लखि लै कर साँटी, बाँधति ऊखल दाम।
6बन्यो “कृपालु” पूत यशुमति को, जगत पिता नँदगाम॥
हिन्दी भावार्थ
उन यशोदा मैया के धन्य भाग्य हैं जो पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण को 'कनुवाँ'एवं बलराम को 'बलुआ 'कहकर बुलाती हैं। श्यामसुन्दर को धूल में सने हुए देखकर कहती हैं कि तुम पिछले जन्म के सूअर हो (बात भी सत्य है)। पुन: श्यामसुन्दर को पानी में अधिक देर तक खेलते हुए देखकर कहती हैं कि तुम पिछले जन्म के मछली हो (बात भी सत्य है वे शूकर एवं मत्स्य बन चुके हैं।) श्यामसुन्दर के मुख में मिट्टी देखकर हाथ में डण्डा लेकर डराती हुई रस्सी से ऊखल में बाँध देती हैं। 'कृपालु' के शब्दों में सम्पूर्ण जगत् के पिता नन्दग्राम में एक अहीरनी यशोदा के पुत्र बने हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 276