श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 10
विराजत ब्रह्म नंद के अंक।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: virājata brahma nanda ke aṅka
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1विराजत ब्रह्म नंद के अंक।
2किलकत अति आनंद नंदसुत, सुतनु लपेटे पंक।
3धूरि धूसरित अंग रंग लखि, भयहु अनंगहिं शंक।
4रोम रोम आनंद नंद तनु, जनु लहि पारस रंक।
5निज कुल महँ निज पितु कहँ लखि जनु, निशि मुसकात मयंक।
6लखत “कृपालु” अलखवादिन यह, झांकी भृकुटिन बंक॥
हिन्दी भावार्थ
श्री नन्दजी की गोद में ब्रह्म विराजमान है जिसकी शोभा देखते ही बनती है। श्री श्यामसुन्दर अत्यन्त आनन्द के कारण किलक रहे हैं। उनके सुन्दर शरीर में धूलि लगी हुई है। धूलि में सने हुए श्वेत रंग के बालकृष्ण को देखकर कामदेव को यह भय उत्पन्न हो गया है कि यह कहीं भगवान् शंकर तो नहीं हैं। नन्दजी आनन्द में ऐसे विभोर हो रहे हैं जैसे किसी अत्यन्त निर्धन को पारस मिल गया हो। अपने ही चन्द्र वंश में अपने पिता (वेदों के अनुसार चन्द्रमा भगवान् का मानस पुत्र है) को अवतरित देखकर आनन्दातिरेक से चन्द्रमा मानो रात्रि को मुस्कराता रहता है। 'कृपालु' कहते हैं, कि ब्रह्म को ड निराकार ही मानने वाले ज्ञानी लोग उपरोक्त झाँकी को टेढ़ी भौंह करके देखते हुए विभोर हो रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 275-276