# विराजत ब्रह्म नंद के अंक।

स्थायी पृष्ठ: https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0278-m07-k010/
भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0278-M07-K010
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 10
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 128–129

[English](https://radhey.shreyam1008.com.np/en/prem-ras-madira/pad/prm-0278-m07-k010/) · [पुस्तक की अनुक्रमणिका](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/) · [दोनों भाषाओं में पुस्तक पढ़ें](https://radhey.shreyam1008.com.np/PRM/?pad=278&mode=reader&lang=both) · [दोनों भाषाओं का स्रोत पाठ](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/prm/prm-0278-m07-k010.md)

## मूल पद

<a id="line-1"></a>विराजत ब्रह्म नंद के अंक।  
<a id="line-2"></a>किलकत अति आनंद नंदसुत, सुतनु लपेटे पंक।  
<a id="line-3"></a>धूरि धूसरित अंग रंग लखि, भयहु अनंगहिं शंक।  
<a id="line-4"></a>रोम रोम आनंद नंद तनु, जनु लहि पारस रंक।  
<a id="line-5"></a>निज कुल महँ निज पितु कहँ लखि जनु, निशि मुसकात मयंक।  
<a id="line-6"></a>लखत “कृपालु” अलखवादिन यह, झांकी भृकुटिन बंक॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

श्री नन्दजी की गोद में ब्रह्म विराजमान है जिसकी शोभा देखते ही बनती है। श्री श्यामसुन्दर अत्यन्त आनन्द के कारण किलक रहे हैं। उनके सुन्दर शरीर में धूलि लगी हुई है। धूलि में सने हुए श्वेत रंग के बालकृष्ण को देखकर कामदेव को यह भय उत्पन्न हो गया है कि यह कहीं भगवान् शंकर तो नहीं हैं। नन्दजी आनन्द में ऐसे विभोर हो रहे हैं जैसे किसी अत्यन्त निर्धन को पारस मिल गया हो। अपने ही चन्द्र वंश में अपने पिता (वेदों के अनुसार चन्द्रमा भगवान् का मानस पुत्र है) को अवतरित देखकर आनन्दातिरेक से चन्द्रमा मानो रात्रि को मुस्कराता रहता है। 'कृपालु' कहते हैं, कि ब्रह्म को ड निराकार ही मानने वाले ज्ञानी लोग उपरोक्त झाँकी को टेढ़ी भौंह करके देखते हुए विभोर हो रहे हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 275-276

[पिछला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0277-m07-k009/) · [अगला पद](https://radhey.shreyam1008.com.np/prem-ras-madira/pad/prm-0279-m07-k011/)

## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

- [आधिकारिक पूर्ण साहित्य संग्रह](https://www.jkpliterature.org.in/)
- [लेखक का आधिकारिक परिचय](https://jagadgurukripalujimaharaj.org.in/)
- [प्रेम रस मदिरा: आधिकारिक पुस्तक विवरण](https://www.jkpliterature.org.in/products/prem-ras-madira-regular-size)
- [संस्करण और स्रोत प्रमाण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/provenance.json)
- [पुस्तकालय के आवरणों का स्रोत विवरण](https://radhey.shreyam1008.com.np/content/books/index.json)
- [स्रोत और पाठ-सुधार](https://radhey.shreyam1008.com.np/collection/)

मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
