श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 9
कबै कहि मैया! मोहिं बुलाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kabai kahi maiyā! mohiṁ bulāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कबै कहि मैया! मोहिं बुलाय।
2हलधर सों"भैया, भैया", कहि"बाबा"कहि नँदराय।
3ठुमुकि ठुमुकि कब निज पग अइहैं, मो ढिग अति अकुलाय।
4कब झगरहिं आँचर गहि मोहन, माखन हित विरुझाय।
5कब पग पटकत लोटत भू पर, करहिं मान बिलखाय।
6कब “कृपालु” नँदराय गोद तजि, धाय माय लिपटाय॥
हिन्दी भावार्थ
(यशोदा बालकृष्ण को गोद में लिए हुए मन-ही मन भविष्य की कामना करती हैं।) वह दिन कब आयेगा जब मेरा कन्हैया मुझे मैया कहकर पुकारेगा? इसी प्रकार कब बलदाऊ जी को भेया, एवं नंद जी को बाबा कहकर पुकारेगा? कब मेरे प्रेम में विभोर होकर अपने ही पैरों के बल से ठुमक ठुमक कर मेरे पास आयेगा? कब मेरा लाल मेरा आंचल पकड़ कर मक्खन के लिए हठपूर्वक झगड़ा करेगा? तथा कब पृथ्वी पर लोटता एवं पैरों को पटकता हुआ आँसू बहाकर रूठ जायगा और मैं मनाकर लाऊँगी? 'कृपालु' कहते हैं कि वह दिन कब आयेगा जब नन्द बाबा की गोद में बैठा हुआ मेरा लाल मुझे देखते ही दौड़कर मुझसे लिपट जायगा? (पुत्र का प्रेम माता के प्रति पिता से कई गुना अधिक होता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 274-275