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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 8

बड़ो कब ह्वैहैं हमरो लाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: bad̤o kaba hvaihaiṁ hamaro lāla?

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1बड़ो कब ह्वैहैं हमरो लाल।

2कब चलिहहिं घुटुवन बल आँगन, करिहैं हमहिं निहाल।

3कब कर-अँगुरि पकरि ह्वै ठाढ़ो, चलिहैं लटपट चाल।

4कब तुतरिन बतियन कछु मोते, बोलिहहिं वचन रसाल।

5कब दृग जल भरि मम अंचल गहि, कछु मँगिहहिं गोपाल।

6कब “कृपालु” मोते कह"मैया,"इमि कहि चूमति गाल॥

हिन्दी भावार्थ

यशोदा अपने लाल को गोद में लेकर वात्सल्य प्रेम में विभोर होकर विधाता से. कामना करती हैं, और कहती हैं कि वह दिन कब आयेगा जब मेरे लाल बड़े हो जायेंगे। कब हमारे आँगन में घुटनों के बल चलते हुए हमें निहाल करेंगे। कब हमारे हाथ की अँगुलियों के सहारे खड़े होकर लड्खड़ाते हुए चलेंगे। कब हमसे तोतली भाषा में मधुर-मधुर बाल-विनोद-युक्त बातें करेंगे। कब अपनी आँखों में आँसू भरकर हमारा अंचल पकड़े हुए कोई वस्तु माँगेंगे। 'कृपालु' कहते हैं कि मुझे मेरा लाल कौन सी घड़ी में "मैया 'कहेगा? इसके पश्चात् वात्सल्य-प्रेम में विभोर यशोदा कुछ भी न कह सकी। इतना ही कहकर बार-बार अत्यन्त प्यार से अपने लाल के दोनों गाल चूमने लगीं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 273-274