श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 12
सखि कालि लखी नँदलाल रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sakhi kāli lakhī naṁdalāla re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सखि कालि लखी नँदलाल रे।
2गई रही कछु काम महरि घर, तहँ खेलत गोपाल रे।
3सिर पर वाके मोर चंद्रिका, लट कारी घुंघराल रे।
4पीत झँगुलिया झलमल झलकत, हलकत कुंडल गाल रे।
5कटि किंकिनि पग पायल बाजति, चलत घुटुरुवनि चाल रे।
6लखतहिं मदन गुपाल सखी मैं, भई हाल बेहाल रे।
7जो “कृपालु” सब जगहिं नचावत, नाचत यशुमति ताल रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है,'अरी सखि! कल मैंने बालकुष्ण को देखा। कुछ काम से गयी थी। वहाँ वह खेल रहे थे। पर मोर मुकुट सुशोभित था। थे। उनके शरीर पर पीले रंग की झँगुली झलमला रही थी। उनके कान के कुण्डल गाल पर हिल रहे थे। किंकिणि एवं पैर में पायल बज रही थीं। चल रहे थे। अरी सखि! तत्काल पागल सी हो गयी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जो सारे संसार को अपनी माया से नचाता है उसको भी मैया अपने हाथों की तालियों से नचा रही थी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 276-277