श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 4
नंद के भये आजु आनंद।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nanda ke bhaye āju ānanda
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नंद के भये आजु आनंद।
2ब्रह्म सच्चिदानंद रूप धरि, प्रकट्यो आनँदकंद।
3देव-वृंद दुंदुभिहिं बजावत, कहि कहि जय ब्रजचंद।
4मंगल-गान करत ब्रह्मादिक, गाइ चारि श्रुतिछंद।
5नारद शारद ज्ञान-विशारद, भाग्य सराहत नंद।
6होत “कृपालु” सुकृत यशुमति लखि, वाणिहुँ वाणी बंद॥
हिन्दी भावार्थ
आज नन्द महर के घर में आनन्द मूर्तिमान हो कर प्रकट हुआ है, क्योंकि आनन्दकंद सच्चिदानंद ब्रह्म श्रीकृष्ण चन्द्र ने सगुण साकार अवतार धारण किया है, जिसके आनन्द में देवताओं के समूह 'ब्रज चंद की जय हो'ऐसा कहकर दुंदुभी बजा रहे हैं। ब्रह्मादिक चारों वेदों की ऋचाओं का उच्चारण करते हुए मंगल गान कर रहे हैं। ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ महर्षि नारद एवं सरस्वती जी नन्द के भाग्य की भूरि-भूरि सराहना कर रहे हैं। कृपालु' कहते हैं कि यशोदा मैया के पुण्य पुंज के बखान करते समय साक्षात् सरस्वती की भी वाणी रुक जाती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 267-268