श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 3
नंद के आँगन आनँदकंद।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nanda ke āṁgana ānaṁdakanda
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नंद के आँगन आनँदकंद।
2आनंदहुँ के आनँददाता, बने आय नँदनंद।
3कबहुँक किलकत चलत लजत लखि, गति मदमत्त गयंद।
4कबहुँक नाचत गावत कबहुँक, बिनुहिं छंद स्वच्छंद।
5कबहुँक तोतरि बोलनि सों कछु, माँगत यशुमति नंद।
6लखि “कृपालु” बरबस बिसरावत, ज्ञानिहुँ ब्रह्मानंद॥
हिन्दी भावार्थ
नंद के आँगन में मूर्तिमान आनन्द को भी आनन्द देने वाले आनंदकंद नंद-नंदन विहार कर रहे हैं। कभी किलकारी मार कर लटपटाती हुई मतवाली चाल से मतवाले हाथी की चाल को भी लज्जित करते हैं। कभी नाचते हैं एवं कभी बिना पद्ययुक्त छंद को ही स्वच्छन्द रूप से गाते हैं और कभी तोतली भाषा में मैया यशोदा एवं बाबा नंद से कुछ माँगते हैं।"कृपालु कहते हैं कि उपरोक्त झाँकी को देखकर ज्ञानी लोग अपने निराकार ब्रह्म के आनन्द को बरबस भूल जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 267