श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 2
नंद-महर-घर बजत बधाई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: nanda-mahara ghara bajata badhāī!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1नंद-महर-घर बजत बधाई।
2जायो पूत आजु नँदरानी,
3नाचत गावत लोग लुगाई।
4दूध, दही माखन की काँदौ,
5सब मिलि भादौं मास मचाई।
6बाजत झाँझ मृदंग उपंगहिं,
7वीना वेनु शंख शहनाई।
8छिरकत चोवा चंदन थिरकत,
9करि जयकार कुसुम बरसाई।
10शिव समाधि बिसराइ भजे ब्रज,
11देखन के मिस कुँवर कन्हाई।
12याचक भये अयाचक सिगरे,
13हम “कृपालु” धनि ब्रजरज पाई॥
हिन्दी भावार्थ
गोकुल में नन्दराय बाबा के घर में श्रीकृष्ण के अवतार लेने के उपलक्ष्य में बधाई बज रही है। (यद्यपि श्रीकृष्ण का अवतार मथुरा में लीला-रूप से देवकी के गर्भ से हुआ था, एवं अर्धरात्र के ही समय वसुदेव श्रीकृष्ण को उनको योगमाया के सहारे यशोदा के पास सुला आये, एवं उसी समय यशोदा के गर्भ से उत्पन्न योगमाया को अपने साथ ले आये थे किन्तु प्रकट रूप से यह रहस्य यशोदा भी नहीं जानती थी। केवल वसुदेव, देवकी ही जानते थे। अतएव समस्त गोकुल ग्राम-वासियों को यही ज्ञान रहा कि आज रात को यशोदा के ही गर्भ से श्रीकृष्ण जन्म हुआ है। समस्त गोकुल के नर-नारी नाचते-गाते हुए आनन्द विभोर होकर कह रहे हैं कि आज नन्दरानी के लाल हुआ (नन्द के आनन्द भये, जै कन्हैया लाल की)। भादों के महीने में कृष्ण-पक्ष की नवमी तिथि पर समस्त नर-नारियों ने दूध, दही, मक्खन आदि को छिड़कते हुए सारे गोकुल में कीचड़-ही-कीचड़ कर दी (दधि-काँदों)। प्रकार के बाजे बजने लगे। चोवा, चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों को एक दूसरे पर छिड्कते हुए नाच-नाचकर पुष्प-वर्षा करते हुए कन्हैया की जयकारें करने लगे। शंकर जी भी अपनी निर्विकल्य समाधि भुलाते हुए अपने इष्टदेव, प्रेमावतार यशोदा के लाल कुँवरकन्हैया के दर्शन के लिए शिवलोक से भागे भागे गोकुल चले आये। जिसने जो कुछ भी माँगा उस याचक को वही दिया गया। 'कृपालु' कहते हैं कि जिनको बड़ी बड़ी चीजें मिलीं वह अपनी जानें, हम तो ब्रज की धूल ही पाकर कृतार्थ हो गये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 265-267