लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 1

अस जसुमति के भये लाल रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: asa jasumati ke bhaye lāla re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अस जसुमति के भये लाल रे।

2लोग लुगाइन जनु निधि पाइन, नाचति सब दै ताल रे।

3कलियन-कुसुम बिछ्यो नलियन हूँ, गलियन उड़त गुलाल रे।

4कोउ कछु कहत न सुनत सबै सुधि, भूले ग्वालिनि ग्वाल रे।

5मोहन-मंत्र डर्यो जनु ब्रज महँ, गइ सुधि तिय सुत बाल रे।

6कहँ लौं कहिय “कृपालु” देख जोइ, यह सुख सोइ बेहाल रे॥

हिन्दी भावार्थ

यशोदा मैया के अनोखे लाल उत्पन्न हुए हैं। उनके जन्म-दिवस पर समस्त स्त्री-पुरुष तालियाँ बजा-बजाकर नाच रहे हैं। मानो किसी भिखारी को पड़ी हुई पारसमणि मिल गयी हो। फूलों एवं कलियों से समस्त नालियाँ तक भर गयी हैं एवं गलियों में गुलाल ही गुलाल उड़ रहा है। सभी आनन्द में इतने विभोर हैं कि बेसुध होकर न किसी से कुछ कहते हैं, न किसी की कुछ सुनते हैं। समस्त ब्रज में किसी को भी अपनी स्त्री पति एवं बच्चों को सुधि नहीं है मानो सब के ऊपर मोहनमन्त्र कहें जो भी इस जन्मदिवस के सुख को देखता है वो ही विहल हो जाता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 264-265