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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 5

पालने झूलत बाल गोपाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: pālane jhūlata bāla-gopāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1पालने झूलत बाल गोपाल।

2लोरी गावति मातु झुलावति, लखि लखि होति निहाल।

3शिशु-भूषन-भूषित तन सोहत, मन मोहत ब्रजबाल।

4कर-अरविंद पदारविंद कहँ, मुख-अरविंदहिं डाल।

5कबहुँक दुहुँन पाणि-पग पटकत, किलकत अति नँदलाल।

6कबहुँक फरकावत निज अधरन,"गूँ गूँ"शब्द रसाल।

7कबहुँक लखत मातु ढिग कबहुँक, इत उत दृगन विशाल।

8कबहुँक दृगन मूँदि पुनि रोवत, पोवत अँसुवन-माल।

9विविध खिलौने जननि दिखावति, गावति कछु दै ताल।

10तदपि हठीलो लाल न मानत, ठानत रोदन-जाल।

11जब “कृपालु” लिय अंक दौरि हम, मौन भये ततकाल॥

हिन्दी भावार्थ

यशोदा के आँगन में बालकृष्ण पालने में झूल रहे हैं। यशोदा मधुर स्वर में विविध प्रकार की वात्सल्य से भरी लोरियाँ गा रही हैं, एवं धीरे-धीरे अपने गोपाल को झुला रही हैं तथा बार-बार अपने लाला को देख-देख कर आनन्द विभोर हो रही हैं। बालकृष्ण शिशुओं के समस्त भृंगारों से सुशोभित हो रहे हैं, एवं समस्त गोपियों के मन को हठात् मुग्ध कर रहे हैं। कभी अपने हाथ-रूपी कमल से पैर-रूपी कमल को मुख-रूपी कमल में डालते हैं, कभी अपने दोनों हाथों एवं पैरों को अत्यन्त आनंद में विभोर होकर किलकते हुए पटकते हैं। कभी अपने-आप ही अपने होठों को फड्कते हैं, एवं परम मधुर 'गूँ गूँ'शब्द उच्चारण करते हैं। कभी अपनी मैया को भली-भाँति नहीं पहचानते इसीलिए कभी-कभी अपने चपल विशाल नेत्रों से स्वभावतः इधर-उधर देखने लगते हैं और कभी अकारण ही अपनी आँखों को मूँदकर आँसू बहाने लगते हैं। मैया अपने लाला को चुप कराने के लिए अनेक प्रकार के खिलौने दिखाती हैं, एवं साथ ही ताली बजा-बजाकर कुछ गाती भी है, फिर भी हठीले बालकृष्ण रोना नहीं बन्द करते एवं और भी रोने का ढोंग करने लगते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि मैंने बालकृष्ण के रोने का कारण समझकर ज्यों ही दौड़कर अपनी गोद में ले लिया त्यों ही गोपाल चुप हो गये, क्योंकि वे तो गोद में आने के लिए ही रो रहे थे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 268-269