श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 6
द्वार इक योगी"अलख"पुकार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dwāra ika, yogī ‘alakha’ pukāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1द्वार इक योगी"अलख"पुकार।
2चंद्र-भाल गल मुंड-माल भल, शीश गंग-जलधार।
3रिपु अनंग प्रति अंग भुजंगन, रंग शुभ्र बलिहार।
4नाँव शंभु अरु ठाँव बतावत, गिरि कैलाश मझार।
5घर ते निकरि महरि यशुमति तेहि, पूछति करि सतकार।
6"सुनहु अमंगल भेष! भये मम, मंगलमय सुकुमार।
7या ते जो चाहहु सो माँगहु, मणिन मोतियन-थार"।
8जोगी कह"मैया मैं जोगी, मोहिं न चहिय संसार।
9इहै भीख दे माय कृपा करि, लखौं लाल इक बार"।
10मैया कह"मम लाल डरेगो, जोगी! तोहिं निहार"।
11"सुनु मैया यह लाल तिहारो, सगुण ब्रह्म साकार"।
12"तुम तो जोगी!"अलग अलख", कह, पुनि किमि लख करतार"।
13"मैया! अलख न कह्यों कह्यों हौं, आ लख नंदकुमार"।
14ल्याई लाल यशोमति भोरी, हरि हर दृग भये चार।
15लखि “कृपालु” येहि मधुर-मिलन कहँ, कोटि प्रान दउँ वार॥
हिन्दी भावार्थ
एक ब्रजांगना यशोदा मैया से कहती है, 'तेरे द्वार पर एक योगी अलख, अलख का नारा लगा रहा है। उसके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है, गले में नर मुंडों की माला है, सिर पर गंगा जी बह रही हैं। वह कामदेव का शत्रु है। उसके प्रत्येक अंग में साँप लिपटे हुए हैं, वह गौर वर्ण का है। वह अपना नाम 'शम्भु' बताता है एवं अपना निवास कैलाश पर्वत पर बताता है। यशोदा मैया घर से निकलकर सत्कार सहित कहती हैं कि हे अमंगल-भेष योगी! आज हमारे यहाँ मंगलमय-सुकुमार का जन्म हुआ है। इसलिए मणियों एवं मोतियों के थाल जितने भी चाहो माँग लो। योगी ने कहा 'मैया, मैं विरक्त हूँ। मुझे सांसारिक पदार्थों की कामना नहीं है। अगर तू मुझे भिक्षा ही देना चाहती है तो मैया कृपा करके अपने लाल के एक बार दर्शन करा दे।' मैया ने कहा-'हे योगिराज! यह नहीं हो सकता क्योंकि तुम्हारे अमंगल भेष से मेरा नवजात लाल डर जायगा।' योगी ने कहा- 'अरी मैया, तेरा लाला तो सगुण-साकार-भगवान् का अवतार है।' मैया ने कहा- 'अगर मैं यह भी मान लूँ तो भी तुम्हें दर्शन नहीं करना चाहिये क्योंकि तुम तो भगवान को निराकार ही मानते हुए ''अलख'', ''अलख'' का नारा लगा रहे हो (भगवान् को कोई नहीं देख सकता)। योगी ने कहा-''मैया, मैंने अलख नहीं कहा था, मैंने तो कहा था कि आ, लख अर्थात् आकार ब्रह्म को मूर्तिमान देख।'' मैया ने अपने लाला की प्रशंसा सुनकर भोलेपन के कारण श्यामसुन्दर का दर्शन करा दिया एवं वे दोनों चिर परिचित की भाँति एक दूसरे को देखने लगे। 'कृपालु' कहते हैं कि हम इस हरि-हर मिलन पर करोड़ों प्राण न्यौछावर करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 269-271