प्रेम-माधुरी · पद 5
प्रीति सखि नागिनि सी बल खाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti sakhi nāgini sī bala khāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति सखि नागिनि सी बल खाय।
2दीखत प्रथम अमिय रस-बोरी, पाछे विष बगराय।
3प्रथमहिं दीख परत जोइ हाँसी, सोइ फाँसी बनि जाय।
4मधुर-मिलन-रस-सुधा माधुरी, पियत सबै बौराय।
5पुनि पिय पलक ओट होवत ही, पल पल कलप लखाय।
6मरति न जियति “कृपालु” वियोगिनि, तलफति रहति सदाय॥
हिन्दी भावार्थ
हे सखि! प्रीति की गति सर्पिणी के समान अत्यंत टेढ़ी होती है। यह प्रीति प्रथम तो अमृतरस परिप्लुत-सी दिखाई पड़ती है एवं पीछे जहर सा फैलाती हुई अनुभव में आती है। प्रेमिका को पहले मधुर मिलन की अवस्था में जो बात साधारण विनोद सरीखी प्रतीत होती है वही वियोग की अवस्था में प्राण घातक सी बन जाती है। प्रियतम के मधुर-मिलन रूप प्रेमामृत रस माधुरी को पीते हुए तो उस समय सभी प्रेमिकायें आनन्द में विभोर होकर दीवानी-सी बन जाती हैं, किन्तु प्रियतम के पलकों से ओट होते ही विरहिणी के लिये एक-एक पल कल्प के समान प्रतीत होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह विरहिणी न तो मरती ही है और न जीवित ही रहती है बरन् प्रियतम को मधुर मिलन आकांक्षा में निरन्तर तड़पती रहती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 364-365