प्रेम-माधुरी · पद 4
प्रीति की रीति न जाने कोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti kī rīti na jāne koya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति की रीति न जाने कोय।
2सब कह प्रीति मीन-जल साँची, मो मत"प्रीति बिगोय"।
3ज्यौं निज तनु-हित नर-समीर रति, त्यों निज स्वारथ सोय।
4मधुकर-कमल प्रीति कहँ? लोलुप,-गति अनन्य रति खोय।
5सोऊ तृषा-शमन हित स्वाती, घन-चातक रति जोय।
6मरत प्रेम-पट कारिख पोत्यो, मृग-पतंग रति दोय।
7स्वारथ परमारथ-अतीत कोउ, प्रेम विलक्षण होय।
8सुनु “कृपालु” बिनु कृपा रसिक जन, प्रीति मिले नहिं तोय॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम का वास्तविक स्वरूप कोई नहीं जानता अर्थात् बिरले ही, प्रेम प्राप्त किये हुए रसिक ही जानते हैं। यद्यपि सभी कवि लोग मछली एवं जल के प्रेम को वास्तविक प्रेम कहते हैं किन्तु मेरे सिद्धान्त में तो वह प्रेम का स्वरूप नहीं है। क्योंकि जिस प्रकार मनुष्य आदि अपने शरीर के छूट जाने के भय से वायु के अभाव में परम व्याकुल होते हैं, उसी प्रकार मछली का आहार जल होने से वह अपने शरीर नष्ट हो जाने के भय से तड्पती है। रसिकों के सिद्धांत से (जितेन्द्रिय-सुख-हेतु कामेर तात्पर्य कृष्ण-सुख तात्पर्य प्रेम तो प्रबल) वह स्वार्थ ही है। इसके अतिरिक्त कवि-जन भौरे एवं कमल का प्रेम सत्य बतलाते जज हैं, किन्तु लोलुपता एवं अनन्यता न होने के कारण भौरे का प्रेम भी दूषित है। कवि लोग चातक (पपीहा) एवं बादलों का प्रेम वास्तविक कहते हैं किन्तु वह भी पूर्वोक्त रीति से स्वाति से प्यास बुझाने मात्र स्वार्थ का ही है। हिरन एवं पतंगों का नाद एवं दीपक के प्रति सच्चा प्रेम कहने वाले यह नहीं विचार करते कि यह दोनों ही मर कर अमरत्व प्रदान करने बाले प्रेम पर कलंक का टीका लगाते हैं। वस्तुतः प्रेम तो स्वार्थ एवं परमार्थ, अर्थात् लोक एवं परलोक दोनों से ही परे किसी अनुपम तत्त्व का नाम है (ह्लादिनी शक्तेर परम सार तार प्रेम नाम)। 'कृपालु' कहते हैं कि बिना रसिकजनों की अनुकम्पा के वह वासना रहित दिव्य प्रेम किसी भी साधना के द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 363-364