प्रेम-माधुरी · पद 3
प्रीति की, अति अड़बंगी रीत।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti kī, ati ad̤abaṅgī rīta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति की, अति अड़बंगी रीत।
2जोरत जुरे, न तोरत टूटे, रसिकन की अस नीत।
3ज्यों ज्यों चढ़त प्रेम रँग त्यों त्यों, जग सों होत अतीत।
4कबहुँ भूत पिशाचग्रही ज्यों, कबहुँ वेद विपरीत।
5कबहुँ शिष्ट बनि जात जगत सम, कबहूँ भ्रष्ट पलीत।
6विचरत अति विचित्र गति भूतल, करत “कृपालु” पुनीत॥
हिन्दी भावार्थ
प्रेम की अत्यन्त ही विचित्र एवं टेढ़ी गति होती है। प्रेम न तो जोड़ने से जुड़ता है और न तोड़ने से टूटता ही है, वह तो अधिकारी जीवों के लिए महापुरुषों की कृपा-रूप एक देन है, ऐसा रसिकों का सिद्धांत है। जितनी-जितनी मात्रा में प्रेम का रँग अंतःकरण पर चढता जाता है, उतनी ही मात्रा में वह जीव भी संसार के मायिक स्तर से ऊँचा उठता जाता है। प्रेम प्राप्त कर लेने पर वह, कभी भूत-प्रेत लगे हुए के समान दिखाई पड़ता है, कभी वेद की मर्यादाओं के भी विरुद्ध कार्य करता दिखाई पड़ता है। वह प्रेमी कभी तो सांसारिक जीवों के समान सभ्य बन जाता है एवं कभी अत्यन्त गया-गुजरा-सा दिखाई पड़ता है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह प्रेमी अत्यन्त अद्भुत गति से समस्त पृथ्वी पर घूमता हुआ जीवों को पवित्र करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 362-363