# प्रीति की, अति अड़बंगी रीत।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0264-M06-K003
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रेम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 3
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 120–121

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>प्रीति की, अति अड़बंगी रीत।  
<a id="line-2"></a>जोरत जुरे, न तोरत टूटे, रसिकन की अस नीत।  
<a id="line-3"></a>ज्यों ज्यों चढ़त प्रेम रँग त्यों त्यों, जग सों होत अतीत।  
<a id="line-4"></a>कबहुँ भूत पिशाचग्रही ज्यों, कबहुँ वेद विपरीत।  
<a id="line-5"></a>कबहुँ शिष्ट बनि जात जगत सम, कबहूँ भ्रष्ट पलीत।  
<a id="line-6"></a>विचरत अति विचित्र गति भूतल, करत “कृपालु” पुनीत॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

प्रेम की अत्यन्त ही विचित्र एवं टेढ़ी गति होती है। प्रेम न तो जोड़ने से जुड़ता है और न तोड़ने से टूटता ही है, वह तो अधिकारी जीवों के लिए महापुरुषों की कृपा-रूप एक देन है, ऐसा रसिकों का सिद्धांत है। जितनी-जितनी मात्रा में प्रेम का रँग अंतःकरण पर चढता जाता है, उतनी ही मात्रा में वह जीव भी संसार के मायिक स्तर से ऊँचा उठता जाता है। प्रेम प्राप्त कर लेने पर वह, कभी भूत-प्रेत लगे हुए के समान दिखाई पड़ता है, कभी वेद की मर्यादाओं के भी विरुद्ध कार्य करता दिखाई पड़ता है। वह प्रेमी कभी तो सांसारिक जीवों के समान सभ्य बन जाता है एवं कभी अत्यन्त गया-गुजरा-सा दिखाई पड़ता है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह प्रेमी अत्यन्त अद्भुत गति से समस्त पृथ्वी पर घूमता हुआ जीवों को पवित्र करता है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 362-363

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
