प्रेम-माधुरी · पद 2
प्रीति की अति अटपट गति हाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prīti kī ati aṭapaṭa gati hāya!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1प्रीति की अति अटपट गति हाय।
2"गोपनीय अति"कहत रसिक जन, सोचत उचित लखाय।
3पै जब प्रेम सिंधु बढ़ि उमड़त, मन बुधि देत डुबाय।
4उठति तरंग अंग अंगनि नव, कौन थाह तेहि पाय।
5जहँ मन गमन न बुधि बल संबल, तहँ को केहि समुझाय।
6यह “कृपालु” गोपन तब ही लौं, जब लौं करि सक जाय॥
हिन्दी भावार्थ
अरी दैया! प्रेम की अत्यन्त ही विचित्र एवं टेढ़ी बातें हैं। यद्यपि महापुरुष कहते हैं कि प्रेम सदा ही छिपाना चाहिए। विचार करने से यह सिद्धान्त ठीक भी मालूम पड़ता है, किन्तु जब प्रेम के समुद्र में अत्यधिक बाढ़ आ जाती है तब वह मन एवं बुद्धि को भी डुबा देती है। प्रेमी के अंग में नहीं सकती, एवं बीच ही में डूब जाती है, तन प्रेमी प्रेम विभोर बुद्धि से किस प्रकार कुछ सिद्धान्त सोच सकता है। 'कृपालु' कहते हैं कि यह प्रेम अधिक मात्रा में बढ़ जाने पर स्वयं ही सात्विक भावों (स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, कम्प, स्वर-भेद, वैवर्ण्य आँसू एवं मूर्छा) के रूप में प्रकट हो जाता है। किन्तु जब तक स्वाभाविक ही ऐसा न हो जाय, तब तक बड़ी सावधानी के साथ प्रेम को छिपाना चाहिए अन्यथा वह लोकरंजन का ग्रास बन जायगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 361-362