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RADHEY RADHEY

प्रेम-माधुरी · पद 1

धन्य प्रेम गोपीजन त्रिभुवन,

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dhanya prema gopījana tribhuvana, pūraṇa brahma jāsu bharamāvata

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1धन्य प्रेम गोपीजन त्रिभुवन,

2पूरण ब्रह्म जासु भरमावत।

3जो असंख्य ब्रह्माण्ड सृजत सो,

4ब्रज अहीर नँदपूत कहावत।

5जिनकी नेकु योगमाया ते,

6जगत नियंत्रित इति श्रुति गावत।

7उनको महरि पकरि कर-अँगुरिन,

8निज आँगन चलिबो सिखरावत।

9जिनकी कृपा कोर विधि हरि हर,

10कोटि कल्प तप करि नहिं पावत।

11उनको झटकि पटकि गोदी ते,

12भौंह तानि नँदरानि रुवावत।

13जिनकी नाम गुणावलि लीला,

14भवबंधन छन माहिं छुटावत।

15उनको मातु बाँधि ऊखल ते,

16लै साँटी कर अति डरपावत।

17जिनकी अति विचित्र माया ते,

18नारदादि को ज्ञान भुलावत।

19उनको देखिय ब्रज मुरली हित,

20गोपिन आगे दृग झरि लावत।

21जिनकी भृकुटि तकति बनि दासी,

22सो माया जो जगहिं नचावत।

23उनको अब “कृपालु” राधे जू,

24क्रीत दास करि पद पलुटावत॥

हिन्दी भावार्थ

(गोपी-प्रेम की महिमा-) तीनों ही लोकों में उस गोपी-प्रेम को धन्य है, जिस प्रेम में बँध कर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण भी अपने आपको भूल जाते हैं। जो पुरुषोत्तम ब्रह्म अनेक ब्रह्मांडों का निर्माण करता है, वही ब्रजांगनाओं के प्रेम के वशीभूत होकर ब्रज में अहीर नन्द का लाल कहलाता है। जिस ब्रह्म की अघटित-घटना-पटीयसी योगमाया के द्वारा अनन्त-कोरि ब्रह्मांडों का नियामन, शासन होता है, जैसा श्रुतियाँ कहती हैं, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी अपने आँगन में अपने हाथ की अँगुलियों के सहारे चलना सिखाती हैं। जिस ब्रह्म की कृपा-कटाक्ष को करोड़ों कल्प तप करने पर भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि नहीं प्राप्त कर पाते, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदाजी अपनी गोद से दूर फेंक कर भौंहों को टेढ़ी अर्थात् आँखें दिखाकर रुलाती हैं। जिस ब्रह्म के विविध प्रकार के नाम, गुण, लीला आदि के द्वारा भव-बंधन क्षण भर में छूट जाता है, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी ऊखल में बाँधकर एवं हाथ में डण्डा लेकर अत्यन्त ही डराती हैं, जिस ब्रह्म की अत्यन्त विचित्र माया से नारदादि मायातीत परमहँसो का भी ज्ञान नष्ट-सा हो जाता है। उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को आज देखो तो, अपनी खोई हुई मुरली को ढूँढ़ता हुआ गोपियों के आगे आँसुओं की झड़ी लगा रहा है। जिस ब्रह्म की त्रिगुणमयी माया समस्त ब्रह्मांडों को बन्दर की तरह नचाती है, वह माया भी डर के मारे जिसकी भौंह देखती है, 'कृपालु' कहते हैं कि उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को वृषभानुनन्दिनी राधिका जी खरीदा हुआ दास (प्राचीन-काल में राजाओं के यहाँ आजन्म के लिए कुछ लोग बिके हुए गुलाम हो जाया करते थे, जो फिर अन्यत्र किसी भी प्रकार नहीं जा सकते थे, उन्हें ही कीत-दास कहते हैं।) बनाकर अपने चरण दबवाती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 359-361