# धन्य प्रेम गोपीजन त्रिभुवन,

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0262-M06-K001
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रेम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 1
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 119–120

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>धन्य प्रेम गोपीजन त्रिभुवन,  
<a id="line-2"></a>पूरण ब्रह्म जासु भरमावत।  
<a id="line-3"></a>जो असंख्य ब्रह्माण्ड सृजत सो,  
<a id="line-4"></a>ब्रज अहीर नँदपूत कहावत।  
<a id="line-5"></a>जिनकी नेकु योगमाया ते,  
<a id="line-6"></a>जगत नियंत्रित इति श्रुति गावत।  
<a id="line-7"></a>उनको महरि पकरि कर-अँगुरिन,  
<a id="line-8"></a>निज आँगन चलिबो सिखरावत।  
<a id="line-9"></a>जिनकी कृपा कोर विधि हरि हर,  
<a id="line-10"></a>कोटि कल्प तप करि नहिं पावत।  
<a id="line-11"></a>उनको झटकि पटकि गोदी ते,  
<a id="line-12"></a>भौंह तानि नँदरानि रुवावत।  
<a id="line-13"></a>जिनकी नाम गुणावलि लीला,  
<a id="line-14"></a>भवबंधन छन माहिं छुटावत।  
<a id="line-15"></a>उनको मातु बाँधि ऊखल ते,  
<a id="line-16"></a>लै साँटी कर अति डरपावत।  
<a id="line-17"></a>जिनकी अति विचित्र माया ते,  
<a id="line-18"></a>नारदादि को ज्ञान भुलावत।  
<a id="line-19"></a>उनको देखिय ब्रज मुरली हित,  
<a id="line-20"></a>गोपिन आगे दृग झरि लावत।  
<a id="line-21"></a>जिनकी भृकुटि तकति बनि दासी,  
<a id="line-22"></a>सो माया जो जगहिं नचावत।  
<a id="line-23"></a>उनको अब “कृपालु” राधे जू,  
<a id="line-24"></a>क्रीत दास करि पद पलुटावत॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(गोपी-प्रेम की महिमा-) तीनों ही लोकों में उस गोपी-प्रेम को धन्य है, जिस प्रेम में बँध कर पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण भी अपने आपको भूल जाते हैं। जो पुरुषोत्तम ब्रह्म अनेक ब्रह्मांडों का निर्माण करता है, वही ब्रजांगनाओं के प्रेम के वशीभूत होकर ब्रज में अहीर नन्द का लाल कहलाता है। जिस ब्रह्म की अघटित-घटना-पटीयसी योगमाया के द्वारा अनन्त-कोरि ब्रह्मांडों का नियामन, शासन होता है, जैसा श्रुतियाँ कहती हैं, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी अपने आँगन में अपने हाथ की अँगुलियों के सहारे चलना सिखाती हैं। जिस ब्रह्म की कृपा-कटाक्ष को करोड़ों कल्प तप करने पर भी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि नहीं प्राप्त कर पाते, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदाजी अपनी गोद से दूर फेंक कर भौंहों को टेढ़ी अर्थात् आँखें दिखाकर रुलाती हैं। जिस ब्रह्म के विविध प्रकार के नाम, गुण, लीला आदि के द्वारा भव-बंधन क्षण भर में छूट जाता है, उसी पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को यशोदा जी ऊखल में बाँधकर एवं हाथ में डण्डा लेकर अत्यन्त ही डराती हैं, जिस ब्रह्म की अत्यन्त विचित्र माया से नारदादि मायातीत परमहँसो का भी ज्ञान नष्ट-सा हो जाता है। उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को आज देखो तो, अपनी खोई हुई मुरली को ढूँढ़ता हुआ गोपियों के आगे आँसुओं की झड़ी लगा रहा है। जिस ब्रह्म की त्रिगुणमयी माया समस्त ब्रह्मांडों को बन्दर की तरह नचाती है, वह माया भी डर के मारे जिसकी भौंह देखती है, 'कृपालु' कहते हैं कि उसी पूर्णतम पुरुषोत्तम ब्रह्म श्रीकृष्ण को वृषभानुनन्दिनी राधिका जी खरीदा हुआ दास (प्राचीन-काल में राजाओं के यहाँ आजन्म के लिए कुछ लोग बिके हुए गुलाम हो जाया करते थे, जो फिर अन्यत्र किसी भी प्रकार नहीं जा सकते थे, उन्हें ही कीत-दास कहते हैं।) बनाकर अपने चरण दबवाती हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 359-361

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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