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RADHEY RADHEY

धाम-माधुरी · पद 5

हमारो माई, श्री बरसानो गाम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro māī, shrī barasāno gāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो माई, श्री बरसानो गाम।

2महरानी राधा ठकुरानी, सरस सुखद अभिराम।

3गहवर-वन वृषभानुकुंड वर, प्रेमसरोवर ठाम।

4विधि हरि हर दुर्लभ रजधानी, श्री वृंदावन धाम।

5विहरत निज स्वामिनि सँग कुंजनि, पुंजनि आठों याम।

6डगर बुहारत पंथ निहारत, रहत ब्रह्म घनश्याम।

7छके “कृपालु” प्रेम रस डोलत, लै लै राधे नाम॥

हिन्दी भावार्थ

अरी माई! मेरा तो ग्राम बरसाना है। राधा ठकुरानी जो प्रेम की निधि एवं आनन्द की खान हैं, वे ही हमारी महारानी हैं। यहाँ गह्वरवन, वृषभानुकुण्ड एवं प्रेम-सरोवर आदि दिव्य स्थान हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शंकर से भी अप्राप्य श्री वृन्दावन धाम हमारी राजधानी है। जहाँ हम किशोरी जी के साथ दिन-रात विविध कुंजों में रास का रसास्वादन करते रहते हैं। ब्रह्म श्रीकृष्ण ही वहाँ किशोरी जी के लिये झाड़ लगाते हुए मार्ग साफ करते हैं तथा उनकी प्रतीक्षा करते रहते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि हम भी 'राधे, राधे 'कहते हुए प्रेम-रस-मदिरा में उन्मत्त वहाँ डोला करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 261-263