धाम-माधुरी · पद 4
हमारो धन, श्री बरसानो धाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro dhana, shrī barasāno dhāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो धन, श्री बरसानो धाम।
2जहँ विहरति मनमोहन-मोहिनि, मोहिनि-मोहन श्याम।
3लखि वैकुण्ठ कोटि शत लाजत, अद्भुत अनुपम ग्राम।
4मंजुल-कुंज-लता-पुंजन वन, गहवर अति अभिराम।
5पीरी पोखर, प्रेम सरोवर, कमल-सुशोभि ललाम।
6विकसित कुसुम पारिजातादिक, बस बसंत जेहि ठाम।
7खोरि साँकरी बिच सखि नचवति, ब्रह्म श्याम बिनु दाम।
8"हा-हा, खात सखिन सों हरि ललि,-मिलन हेतु वसुयाम।
9आरत ब्रह्म पुकारत गलियन, लै नित राधे नाम।
10ब्रह्म “कृपालु” निरंजन बनि गयो, दृग अंजन ब्रजभाम॥
हिन्दी भावार्थ
हमारा सर्वस्व बरसाना-धाम है। जहाँ मनमोहन को मोहित करने वाली श्यामा एवं मनमोहिनी-श्यामा को मोहित करने वाले श्याम नित्य ही विहार करते हैं। जिस अलौकिक अनुपम धाम को देखकर महाविष्णु के करोड़ों बैकुंठ भी लज्जित होते हैं। जहाँ मनोहर अनन्तानन्त लताओं के कुंज एवं अत्यन्त ही सुन्दर गहृरवन है। जहाँ पीरीपोखर प्रेमसरोबर, वृषभानुकुण्ड आदि जलकुण्ड विविध कमलों से सुशोभित हैं। जहाँ खिले हुए कल्प-वृक्ष के फलों से युक्त नित्य ही बसंत ऋतु का निवास है। जहाँ ब्रह्म श्रीकृष्ण को ही सांकरीखोर पर सखियाँ बिना मूल्य के ही नचाती हैं। जहाँ ब्रह्म श्रीकृष्ण किशोरी जी के दर्शन के लिए निरंतर सखियों का निहोरा करते हुए हा हा खाते हैं। जहाँ ब्रह्म भी आर्त होकर गह्वर-गलियों में 'राधे, राधे'की पुकार किया करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिस ब्रह्म को सदा से निरंजन बनने का गर्व था उसे भी किशोरी जी की दासियों ने अपनी आँखों का अंजन बना डाला है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 260-261