धाम-माधुरी · पद 3
लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: lakho re mana, vṛindāvipina-bahāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1लखो रे मन, वृंदा विपिन-बहार।
2जहँ विहरति वृषभानुनंदिनी, छविनिधि नंदकुमार।
3जहँ चिन्मय सब जीव चराचर, जहँ राधे सरकार।
4जहँ बसंत ऋतु वास करत नित, भ्रमर करत गुंजार।
5जहँ विकसित नित कुंद केवड़ा, कर्णिकार कचनार।
6जहँ केकी कोकिला कीर नित, राधे नाम उचार।
7जहँ “कृपालु” जलजा-प्रवेश नहिं, निगम न पावत पार॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! दिव्य-वृन्दावन की अलौकिक बहार देख जहाँ पर प्रिया-प्रियतम नित्य ही विहार करते हैं। जहाँ जड़ जंगम समस्त जीव चिन्मय हैं, जहाँ की महारानी राधा-ठकुरानी हैं, जहाँ नित्य ही बसन्त ऋतु का निवास है तथा जहाँ खिले हुए कुन्द, केवड़ा, कर्णिकार, कचनार आदि फूलों पर भौरे गुंजार किया करते हैं। जहाँ मोर, कोयल, तोते आदि भी निरन्तर राधे राधे'पुकारा करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जहाँ महालक्ष्मी का भी प्रवेश नहीं है एवं जहाँ वेदों की भी गति नहीं है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 260