धाम-माधुरी · पद 2
रसिक जन-धन गोवर्धन धाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: rasikajana-dhana govardhana dhāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1रसिक जन-धन गोवर्धन धाम।
2त्रिगुणातीत दिव्य अति चिन्मय, ब्रज परिकर विश्राम।
3मरकत-मणि-मंडित खंडित मद, गिरि सुमेरु अभिराम।
4राधाकुंड कुसुम सर आदिक, लीलाधाम ललाम।
5मर्दन-मधवा-मद मनमोहन, पूजित पूरनकाम।
6सखन सनातन संग श्याम जहँ, विहरत आठों याम।
7कब “कृपालु” हौंहूँ बड़भागी, ह्वैहौँ बसि अस ठाम॥
हिन्दी भावार्थ
रसिक जनों का सर्वस्व श्री गोवर्धन धाम है जो आ से अतीत है एवं दिव्यातिदिव्य चिन्मय तथा ब्रज के निवासियों का विश्राम स्थान है। वह गोवर्धनधाम मरकत मणियों से सुशोभित तथा सुमेरु गिरि (पर्वत) के भी मद को मर्दन करने वाला है। वहाँ राधाकुंड, कुसुम सरोवर आदि अनेक मनोहर लीला स्थलियाँ हैं, जो इन्द्र के अभिमान को चूर्ण करने वाली, ब्रह्म श्रीकृष्ण से भी पूज्य और कामनाओं से परे हैं। इस गोवर्धनधाम में सनातन गोलोक के श्रीदामा आदि सखाओं के साथ, श्रीकृष्ण सदा ही विविध प्रकार के खेल खेला करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि ऐसे दिव्य गोवर्धनधाम में बस कर हम कब परम भाग्यशाली बनेंगे?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 259