# रसिक जन-धन गोवर्धन धाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0258-M05-K002
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: धाम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 2
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 116–116

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>रसिक जन-धन गोवर्धन धाम।  
<a id="line-2"></a>त्रिगुणातीत दिव्य अति चिन्मय, ब्रज परिकर विश्राम।  
<a id="line-3"></a>मरकत-मणि-मंडित खंडित मद, गिरि सुमेरु अभिराम।  
<a id="line-4"></a>राधाकुंड कुसुम सर आदिक, लीलाधाम ललाम।  
<a id="line-5"></a>मर्दन-मधवा-मद मनमोहन, पूजित पूरनकाम।  
<a id="line-6"></a>सखन सनातन संग श्याम जहँ, विहरत आठों याम।  
<a id="line-7"></a>कब “कृपालु” हौंहूँ बड़भागी, ह्वैहौँ बसि अस ठाम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

रसिक जनों का सर्वस्व श्री गोवर्धन धाम है जो आ से अतीत है एवं दिव्यातिदिव्य चिन्मय तथा ब्रज के निवासियों का विश्राम स्थान है। वह गोवर्धनधाम मरकत मणियों से सुशोभित तथा सुमेरु गिरि (पर्वत) के भी मद को मर्दन करने वाला है। वहाँ राधाकुंड, कुसुम सरोवर आदि अनेक मनोहर लीला स्थलियाँ हैं, जो इन्द्र के अभिमान को चूर्ण करने वाली, ब्रह्म श्रीकृष्ण से भी पूज्य और कामनाओं से परे हैं। इस गोवर्धनधाम में सनातन गोलोक के श्रीदामा आदि सखाओं के साथ, श्रीकृष्ण सदा ही विविध प्रकार के खेल खेला करते हैं। कृपालु' कहते हैं कि ऐसे दिव्य गोवर्धनधाम में बस कर हम कब परम भाग्यशाली बनेंगे?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 259

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
