धाम-माधुरी · पद 1
चलो मन! श्री वृंदावन धाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalo mana! shrī vṛindāvana dhāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1चलो मन! श्री वृंदावन धाम।
2जहँ विहरत नागरि अरु नागर, कुंजनि आठों याम।
3भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम।
4प्यास लगे तो तरणि-तनूजा, तट पिवु सलिल ललाम।
5नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम।
6ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय, तन्मय रहु अविराम।
7पै “कृपालु” मन! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम॥
हिन्दी भावार्थ
हे मन! तू दिव्य चिन्मय वृन्दावन-धाम में चल जहाँ लाडली और लाल विविध कुंजों में आठों याम विहार किया करते हैं। यदि तुझे भूख लगे तो महापुरुषों की जूठन खाकर सुखी होना। जब प्यास लगे, यमुना का निर्मल जल पी लिया करना। जब सोने की इच्छा हो तब स्वाभाविक बने हुए नताओं के कुंज घरों में सो जाया करना। अरे मन! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरूप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन!! किन्तु यह न भूलना कि इन सब में तेरा भाव निष्काम ही रहे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 258-259