# चलो मन! श्री वृंदावन धाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0257-M05-K001
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: धाम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 1
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 116–116

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>चलो मन! श्री वृंदावन धाम।  
<a id="line-2"></a>जहँ विहरत नागरि अरु नागर, कुंजनि आठों याम।  
<a id="line-3"></a>भूख लगे तो रसिकन जूठनि, खाइ लहिय विश्राम।  
<a id="line-4"></a>प्यास लगे तो तरणि-तनूजा, तट पिवु सलिल ललाम।  
<a id="line-5"></a>नींद लगे तो जाइ सोइ रहु, लतन-कुंज अभिराम।  
<a id="line-6"></a>ब्रज की रेनु रेनु लखि चिन्मय, तन्मय रहु अविराम।  
<a id="line-7"></a>पै “कृपालु” मन! जनि यह भूलिय, भाव रहे निष्काम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे मन! तू दिव्य चिन्मय वृन्दावन-धाम में चल जहाँ लाडली और लाल विविध कुंजों में आठों याम विहार किया करते हैं। यदि तुझे भूख लगे तो महापुरुषों की जूठन खाकर सुखी होना। जब प्यास लगे, यमुना का निर्मल जल पी लिया करना। जब सोने की इच्छा हो तब स्वाभाविक बने हुए नताओं के कुंज घरों में सो जाया करना। अरे मन! ब्रज के प्रत्येक कण-कण में चिन्मय-स्वरूप देखते हुए सदा ही तन्मय रहा करना। 'कृपालु' कहते हैं कि हे मन!! किन्तु यह न भूलना कि इन सब में तेरा भाव निष्काम ही रहे।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 258-259

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
