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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 105

हौं कहँ लौं हरि रिरियाउँ रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hauṁ kahaṁ lauṁ hari! ririyāuṁ re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हौं कहँ लौं हरि रिरियाउँ रे।

2खरी खरी कछु बात अटपटी, जो सुनु आजु सुनाउँ रे।

3दीनानाथ बने उत सोवत, इत हौं रोवत जाउँ रे।

4तुम बेपीर अहीर नंद के, केहि विधि तोहिं मनाउँ रे।

5मारी भृगु ने लात जबै तुम, सूधे ह्वै गये साउँ रे।

6अब पछितात “कृपालु” प्रीति करि, हारि गई जब दाउँ रे॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! मैं कहाँ तक गिड़गिड़ाऊँ। यदि सुनना चाहो तो आज कुछ खरी-खरी अटपटी बात सुनाऊँ। तुम दीनानाथ की उपाधि लिये हुए सो रहे हो और इधर मैं रोता जा रहा हूँ। यह कौन सा न्याय है? तुम नन्द अहीर के लड़के हो, अत्यन्त निष्ठुर हो। तुम्हें भला कौन मना सकता है। तुमको तो जब भृगु ने लात मारी थी तब तुम सीधे हो गये थे। 'कृपालु' कहते हैं कि तुमसे प्रीति करके हम पछता रहे हैं किन्तु अब क्या हो सकता है अब तो दाँव हार ही चुके।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 256-257