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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 104

हरि कहँ लौं मन समझाउँ रे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hari kahaṁ lauṁ mana samajhāuṁ re

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हरि कहँ लौं मन समझाउँ रे।

2मन-मतंग मानत नहिं नेकहुँ, केहि विधि याय मनाउँ रे।

3भरि भरि इन इंद्रिन-विषयन घट, नेकहुँ नाहिं अघाउँ रे।

4धरि धरि स्वाँग लक्ष चौरासी, दर दर ठोकर खाउँ रे।

5बात बघारि महा रसिकन की, तिनकोउ नाउँ लजाउँ रे।

6अब तो सुनहु “कृपालु” बेर भइ, कहँ लौं हौं रिरियाउँ रे॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! मैं इस मन को कहाँ तक समझाऊँ। यह मतवाला मन किसी प्रकार भी नहीं मानता। मैं इसे किस प्रकार मनाऊँ। इन्द्रियों के विषयों के घड़े भर-भरकर मैं थोड़ा भी नहीं अघाता। चौरासी लाख शरीरों का स्वाँग बना-बनाकर दर-दर की ठोकर खा रहा हूँ। महारसिकों की बात बघार कर उनके नाम को भी लज्जित करता हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अब तो गिड़गिड़ाते हुए बहुत दिन बीत गये। हे श्यामसुन्दर! हमारी पुकार सुन लो एवं इस मन को अपने चरण-कमलों का भ्रमर बना लो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 256