लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 103

हमें तो श्याम नाम सों काम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hameṁ to shyāma nāma soṁ kāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमें तो श्याम नाम सों काम।

2नामिहिं-नाम काम इक जब तब, कहा काम मोहिं श्याम।

3निर्मल मन भावत उत श्यामहिं, पतितन-मन इत नाम।

4ब्रह्मादिक जिन ब्रज बनितनि सों, याचत नित रज-पाम।

5उन रसिकन रवनिहुँ तजि दीनी, बसे द्वारिका-धाम।

6पै “कृपालु” यह श्यामहुँ शक्ति न, कर कोउ विरही नाम॥

हिन्दी भावार्थ

हमको तो श्यामसुन्दर के नाम से ही मतलब है। जब श्यामसुन्दर एवं उनके नाम में एक ही बात है, तब मुझे श्यामसुन्दर से क्या मतलब है? फिर श्यामसुन्दर को तो निर्मल मन वाला अच्छा लगता है, किन्तु उनके नाम को तो पतित मन ही अच्छा लगता है। जिन ब्रजांगनाओं की चरणधूलि को देवाधिदेव ब्रह्मादिक याचना करते हैं, उन रसिक-शिरोमणि गोपियों को भी श्यामसुन्दर ने छोड़ दिया, एवं द्वारिका में जा बसे। 'कृपालु' कहते हैं-किन्तु नाम का वियोग कभी भी नहीं हो सकता। यहाँ तक कि श्यामसुन्दर की भी शक्ति नहीं है जो किसी को नाम-वियोगी बना दे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 255-256