दैन्य-माधुरी · पद 102
हमें तो, एक तिहारी आस।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hameṁ to, eka tihārī āsa
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमें तो, एक तिहारी आस।
2काहू के काहू को बल हरि, हमहिं तुमहिं विश्वास।
3कोउ कर योग, यज्ञ दानादिक, कोउ कर जप उपवास।
4कोउ कर चारिधाम तीरथ अरु, कोउ कर काशीवास।
5कोउ कर आस स्वर्ग अपवर्गहिं, कोउ बैकुण्ठ विलास।
6हम “कृपालु” गोपाल! तिहारिहिं, करत आस बनि दास॥
हिन्दी भावार्थ
हे श्यामसुन्दर! हमें तो एकमात्र, तुम्हारी ही आशा है। किसी को किसी के बल पर विश्वास है। कोई योग, यज्ञ दानादिक करता है, कोई जप उपवास आदि करता है, कोई चारों धाम की यात्रा करता है, कोई काशीवास करता है, कोई स्वर्ग एवं मोक्ष की आशा करता है, कोई बैकुण्ठ के ऐश्वर्य की आशा करता है किन्तु 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो केवल तुम्हारे ही दास बनकर तुम्हारी ही आशा करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 254-255