दैन्य-माधुरी · पद 101
हमारो धन, राधे जू को नाम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro dhana, rādhe jū ko nāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो धन, राधे जू को नाम।
2राधे नाम प्रताप श्याम भये, रसिकन में सरनाम।
3राधे नाम सिद्ध कर मुरली, तानन मोह्यो बाम।
4राधे नाम कृपा ते द्वापर, रास रच्यो ब्रजधाम।
5राधे नाम सुनत ही भाजत, हरि अधीर तेहि ठाम।
6राधे नाम रकार बिना रह, श्यामहुँ आधे श्याम।
7करु “कृपालु” राधे राधे की, रटना आठों याम॥
हिन्दी भावार्थ
श्री वृषभानुनंदिनी राधिका जी का नाम ही हमारा वास्तविक धन है। श्रीराधे नाम की कृपा से ही ब्रह्म श्रीकृष्ण रसिकों के सिरमौर कहलाये। राधे नाम को ही सिद्ध करके मुरली द्वारा श्रीकृष्ण ने समस्त ब्रज-गोपियों को मोहित कर लिया। राधे नाम के प्रताप से ही श्रीकृष्ण ने द्वापरावतार में ब्रज धाम में महारास किया। राधे नाम सुनते ही श्रीकृष्ण उस स्थान पर बरबस अधीर होकर भागते हुए चले आते हैं। राधे नाम के रकार के बिना (राधेश्याम शब्द से 'र'निकाल देने पर) श्याम भी आधे श्याम रह जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि ऐसे सर्वोच्च, महत्वपूर्ण 'राधे'नाम की तू निरंतर रटना किया कर जिससे तू भी रसिक बन जाय।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 253-254