दैन्य-माधुरी · पद 100
हमारो ऐसो नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro aiso nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो ऐसो नंदकुमार।
2जैसो नहिं कहुँ भयो न ह्वैहैं, हौं कह भुजहिं पसार।
3फेंट कसे घूमत पतितन हित, पतित उधारनहार।
4विष लगाय कुच प्याय पूतना, लै गई गगन मझार।
5उर दुर्भाव जानिहूँ ताको, मानि मातु दिय तार।
6ब्रह्मलीन शुक सुनि “कृपालु” यह, दीन समाधि बिसार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे श्यामसुन्दर ऐसे दयालु हैं जैसा न कोई हुआ था, न है, न होगा ही। यह मैं दोनों हाथ उठाकर प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ। पतित पावन श्रीकृष्ण पतितों के उद्धार के लिए कमर कसे हुए घूमते रहते हैं। जिस पूतना ने अपने स्तनों में विष लगाकर पिलाया एवं उड़कर आकाश में ले गयी, उसके हृदय को दुर्भावना को जानकर भी उसे माता मान कर तार दिया। 'कृपालु' कहते हैं कि यह बात सुनकर शुकदेव सरीखे परमहंस ने अपनी निर्विकल्प समाधि छोड़ दी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 253