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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 99

हमारी स्वामिनि राधे रानी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī swāmini rādhe rānī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारी स्वामिनि राधे रानी।

2श्री वृषभानु किशोरी भोरी, सरल प्रेम सुख खानी।

3श्री बरसानो नित्यधाम अरु, वृंदावन रजधानी।

4सखिन जूथ सँग नित प्रति नव रस, बरसावति मनमानी।

5ताल तमाल रसाल बोल नित, राधे राधे वानी।

6सिंहासन-आरूढ़ चलति जब, करत ब्रह्म अगवानी।

7लखि “कृपालु” बलि जात कहत जय, जयति जयति महरानी॥

हिन्दी भावार्थ

हमारी स्वामिनी वृषभानुनन्दिनी श्री राधारानी हैं। जो अत्यंत भोली-भाली सरलहृदया एवं प्रेमसुख की खानि हैं। उनका नित्य निवास-धाम श्री बरसाना है, एवं उनकी राजधानी वृन्दावन है। वे करोड़ों सखियों के साथ सदा नित्य नूतन मनमाने ढंग से रास-रस बरसाती हैं। उनके धाम में स्थावर ताल, तमाल, आम्र आदि के वृक्ष भी निरन्तर 'राधे'राधे 'की रटना लगाये रहते हैं एवं जब हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी है जज शश्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य््प्य्््््पा सिंहासन पर बैठकर चलती हैं, तब पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनका स्वागत करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि स्वागत करते हुए ब्रह्म को देखकर मैं बलि-बलि जाता हूँ, एवं बार-बार महारानी राधारानी की जयजयकार बोलता हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 252-253