# हमारी स्वामिनि राधे रानी।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0250-M04-K099
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 99
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 112–113

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारी स्वामिनि राधे रानी।  
<a id="line-2"></a>श्री वृषभानु किशोरी भोरी, सरल प्रेम सुख खानी।  
<a id="line-3"></a>श्री बरसानो नित्यधाम अरु, वृंदावन रजधानी।  
<a id="line-4"></a>सखिन जूथ सँग नित प्रति नव रस, बरसावति मनमानी।  
<a id="line-5"></a>ताल तमाल रसाल बोल नित, राधे राधे वानी।  
<a id="line-6"></a>सिंहासन-आरूढ़ चलति जब, करत ब्रह्म अगवानी।  
<a id="line-7"></a>लखि “कृपालु” बलि जात कहत जय, जयति जयति महरानी॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारी स्वामिनी वृषभानुनन्दिनी श्री राधारानी हैं। जो अत्यंत भोली-भाली सरलहृदया एवं प्रेमसुख की खानि हैं। उनका नित्य निवास-धाम श्री बरसाना है, एवं उनकी राजधानी वृन्दावन है। वे करोड़ों सखियों के साथ सदा नित्य नूतन मनमाने ढंग से रास-रस बरसाती हैं। उनके धाम में स्थावर ताल, तमाल, आम्र आदि के वृक्ष भी निरन्तर 'राधे'राधे 'की रटना लगाये रहते हैं एवं जब हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी है जज शश्य्य्य्य््य्य्य्य्य्य्य््प्य्््््पा सिंहासन पर बैठकर चलती हैं, तब पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनका स्वागत करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि स्वागत करते हुए ब्रह्म को देखकर मैं बलि-बलि जाता हूँ, एवं बार-बार महारानी राधारानी की जयजयकार बोलता हूँ।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 252-253

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
