दैन्य-माधुरी · पद 98
हमारी, सुन लो नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī, suna lo nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी, सुन लो नंदकुमार।
2स्वेदज अरु अण्डज अरु उद्भिज, जनम जरायुज धार।
3तुम सम नाथ पाय हौं भटकत, ज्यों अनाथ सरकार।
4शरणागत को भजन करत तुम, अस कह रसिक पुकार।
5तदपि न कर परतीति मूढ़ मन, विषयन करत विहार।
6हौं “कृपालु” अब हारि गयों प्रभु, टुक मम ओर निहार॥
हिन्दी भावार्थ
हे नन्दकुमार! हमारी प्रार्थना सुन लो। तुम्हारे जैसे अनाथों के नाथ को पाकर भी मैं अनादि काल से स्वेदज अण्डज, उद्भिज, जरायुज इन चार प्रकारों से जन्म ले-लेकर चौरासी लाख योनियों में भटक रहा हूँ। संत लोग पुकार पुकार कर कह रहे हैं कि तुम शरणागत जीवों का भजन करते हो, फिर भी यह मूर्ख मन उनकी बात पर विश्वास नहीं करता एवं बरबस विषय-रस की ओर भागता है। 'कृपालु' कहते हैं-हे नाथ! अब मैं अपने प्रयत्नों से हार चुका, अब तुम्हीं अपनी कृपा से मुझे अपना लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 251-252