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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 97

हमारी, सुन लो नंदकिशोर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī, suna lo nandakishora!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारी, सुन लो नंदकिशोर।

2हम जो करत, हरत सो छन में, चोर बड़े बरजोर।

3करत कामना दिव्य प्रेम की, लेत काम चितचोर।

4ममता तव पद-कंज सोचतहिं, खींचत सुत तिय मोर।

5हौं हौं तुम्हरो दास सोच जब, दंभ देत विष घोर।

6हौं हार्यो “कृपालु” अब सब विधि, करहु कृपा की कोर॥

हिन्दी भावार्थ

हे श्यामसुन्दर! थोड़ी सी हमारी भी प्रार्थना सुन लो। हम जो कुछ करते हैं उसको कामादिक महान् चोर क्षण भर में सब चुरा ले जाते हैं। जब हम दिव्य प्रेम की कामना करते हैं तब सांसारिक कामनाएं चित्त को चुरा ले जाती हैं। जब यह सोचता हूँ कि तुम्हारे चरण कमलों में ही ममता करूँगा तब स्त्री पुत्रादि मुझे अपनी ओर खींच ले जाते हैं। मैं जब यह सोचता हूँ कि मैं तो तुम्हारा सेवक हूँ तब दम्भ आकर अधिकार कर लेता है अर्थात् पाखंड आकर रस में विष मिला देता है। कृपालु' कहते हैं कि अब मैं सभी प्रकार से हार गया। अतएव अपने कृपाकटाक्ष द्वारा बरबस मुझे अपना बना लो!

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 251