दैन्य-माधुरी · पद 96
हमारी सुधि लीजो भानुदुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī sudhi, lījo bhānu-dulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी सुधि लीजो भानुदुलार।
2हमरे कछु साधन-बल नाहीं, अति जड़ कुटिल लबार।
3भ्रमत उदर हित नाम ओट नित, ज्यों कूकर सब द्वार।
4समुझत जगत रसिक मोहिं साँचो, तुम उर जाननिहार।
5सुन्यों कान पतितन अपनावति, शरण गये सुकुमार।
6पुनि कृपालु क्यों भई निठुर अब, एक"कृपालुहिं"बार॥
हिन्दी भावार्थ
हे निकुंजविहारिंणी राधे! हमारी भी खबर लीजिए। हमारे पास किसी प्रकार का कर्म, योग आदि साधन-बल नहीं है। मैं अत्यन्त हठी, दुष्ट एवं बातें बजाने वाला ही हूँ। पेट पालने के लिए आपके नाम की ओट लेकर दिन-रात कुत्ते की तरह सभी संसारी जीवों के द्वार पर घूमा करता हूँ। भोले-भाले संसार के जीव मुझे सचमुच ही महापुरुष समझते हैं, किन्तु हे किशोरी जी! तुम तो हृदय की जानने वाली हो, तुमसे क्या छिपा है? रसिकों के मुख से सुना है कि आपकी शरण में कोई भी महान् से महान् पतित भी चला जाता है तो उसे आप सदा के लिए अपना बना लेती हो। कृपालु' कहते हैं कि यदि यह सच है तो तुम एक 'कृपालु' की ही बार इतनी निष्ठुर कैसे हो गयीं, तुमको तो साधारण जीव भी भोली एवं सरल जानता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 250-251