दैन्य-माधुरी · पद 95
हमारी राधे, दीनन की रखवार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī rādhe, dīnana kī rakhavāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारी राधे, दीनन की रखवार।
2दीन पुकार सुनत ही धावति, तनिक न लावति बार।
3जोगी जपी तपी साधन-बल, खोजत निपट गमार।
4पंच प्रपंच न छूटत रंचक, बहे सिद्धि मझधार।
5जेहि रस लगि हरि हर तरसत सो, बरसत येहि दरबार।
6पियत “कृपालु” सोइ रस जापर, कृपा करति सुकुमार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारी कीर्ति-कुंवरि राधिका दीनों की रक्षा के हेतु सदा कटिबद्ध रहती हैं। दीनों की करुण-पुकार को सुनते ही तत्क्षण ही विहल होकर उसके पास आ जाती हैं। अष्टांग-योग करने वाले, विविध प्रकार के जप करने वाले एवं घोर तपश्चर्या करने वाले मूर्खतावश अपनी साधुना के बल से तुमको पाना चाहते हैं। किन्तु उनकी पंच-ज्ञुनेन्द्रियों के विषयों की आअत्यन्तिक निवृत्ति नहीं हो पाती एवं वे अणिमा, लघिमा, गरिमा आदि अष्ट-महासिद्धियों के चक्कर में पड़कर अपने लक्ष्य को खो बैठते हैं। जिस प्रेम रस के लिए विष्णु, शंकर आदि भी तरसते हैं वही प्रेमरस इस दरबार में दीनों के लिए अकारण ही बरसता रहता है। 'कृपालु' कहते हैं कि इस रस का पान वही कर सकता है, जिस पर तुम अकारण ही कृपा कर देती हो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 249-250