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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 94

हमारी राधे, अति भोरी सरकार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamārī rādhe, ati bhorī sarakāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारी राधे, अति भोरी सरकार।

2हठि हठि दीन जनन अपनावति, देति प्रेम उपहार।

3विधि निषेद को भेद मिटावति, प्रणत भये इक बार।

4निज परिकर बिच करि किंकरि नित, राखत रास मझार।

5निगमागम मुख तकत रहत जो, कहत अगम्य अपार।

6लली “कृपालु” अपेलि करति इमि, सरल सुभायन हार॥

हिन्दी भावार्थ

हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं। वेद में कहे गये विधि-निषेध अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य के झगड़ों से अलग कर देती हैं। केवल एक बार उनकी शरण में जो हो जाये। वे अपनी दिव्य सखियों के परिकर में उस शरणागत को दासी बनाकर निरंतर ही महारास-मण्डल में रख लेती हैं। वेद एवं शास्त्र जो कि किशोरी जी को अगम्य एवं अपार कहते हैं, वे किंकर्तव्यविमूढ-से होकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी अपने सरल स्वभाव एवं भोलेपन के कारण ही वेदों-शास्त्रों के विपरीत इस प्रकार को धांधली-रूप कृपा करती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 248-249