# हमारी राधे, अति भोरी सरकार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0245-M04-K094
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: दैन्य-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 94
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 110–111

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारी राधे, अति भोरी सरकार।  
<a id="line-2"></a>हठि हठि दीन जनन अपनावति, देति प्रेम उपहार।  
<a id="line-3"></a>विधि निषेद को भेद मिटावति, प्रणत भये इक बार।  
<a id="line-4"></a>निज परिकर बिच करि किंकरि नित, राखत रास मझार।  
<a id="line-5"></a>निगमागम मुख तकत रहत जो, कहत अगम्य अपार।  
<a id="line-6"></a>लली “कृपालु” अपेलि करति इमि, सरल सुभायन हार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारी स्वामिनी श्री वृषभानुनन्दिनी अत्यन्त ही बरबस शरणागत दीनजनों को अपना बना लेती हैं, एवं उसे विशुद्ध-प्रेम-दान कर देती हैं। वेद में कहे गये विधि-निषेध अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य के झगड़ों से अलग कर देती हैं। केवल एक बार उनकी शरण में जो हो जाये। वे अपनी दिव्य सखियों के परिकर में उस शरणागत को दासी बनाकर निरंतर ही महारास-मण्डल में रख लेती हैं। वेद एवं शास्त्र जो कि किशोरी जी को अगम्य एवं अपार कहते हैं, वे किंकर्तव्यविमूढ-से होकर आश्चर्यचकित हो जाते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी अपने सरल स्वभाव एवं भोलेपन के कारण ही वेदों-शास्त्रों के विपरीत इस प्रकार को धांधली-रूप कृपा करती हैं।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 248-249

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
