# हमारो धन, श्री बरसानो धाम।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0260-M05-K004
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: धाम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 4
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 117–118

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो धन, श्री बरसानो धाम।  
<a id="line-2"></a>जहँ विहरति मनमोहन-मोहिनि, मोहिनि-मोहन श्याम।  
<a id="line-3"></a>लखि वैकुण्ठ कोटि शत लाजत, अद्भुत अनुपम ग्राम।  
<a id="line-4"></a>मंजुल-कुंज-लता-पुंजन वन, गहवर अति अभिराम।  
<a id="line-5"></a>पीरी पोखर, प्रेम सरोवर, कमल-सुशोभि ललाम।  
<a id="line-6"></a>विकसित कुसुम पारिजातादिक, बस बसंत जेहि ठाम।  
<a id="line-7"></a>खोरि साँकरी बिच सखि नचवति, ब्रह्म श्याम बिनु दाम।  
<a id="line-8"></a>"हा-हा, खात सखिन सों हरि ललि,-मिलन हेतु वसुयाम।  
<a id="line-9"></a>आरत ब्रह्म पुकारत गलियन, लै नित राधे नाम।  
<a id="line-10"></a>ब्रह्म “कृपालु” निरंजन बनि गयो, दृग अंजन ब्रजभाम॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हमारा सर्वस्व बरसाना-धाम है। जहाँ मनमोहन को मोहित करने वाली श्यामा एवं मनमोहिनी-श्यामा को मोहित करने वाले श्याम नित्य ही विहार करते हैं। जिस अलौकिक अनुपम धाम को देखकर महाविष्णु के करोड़ों बैकुंठ भी लज्जित होते हैं। जहाँ मनोहर अनन्तानन्त लताओं के कुंज एवं अत्यन्त ही सुन्दर गहृरवन है। जहाँ पीरीपोखर प्रेमसरोबर, वृषभानुकुण्ड आदि जलकुण्ड विविध कमलों से सुशोभित हैं। जहाँ खिले हुए कल्प-वृक्ष के फलों से युक्त नित्य ही बसंत ऋतु का निवास है। जहाँ ब्रह्म श्रीकृष्ण को ही सांकरीखोर पर सखियाँ बिना मूल्य के ही नचाती हैं। जहाँ ब्रह्म श्रीकृष्ण किशोरी जी के दर्शन के लिए निरंतर सखियों का निहोरा करते हुए हा हा खाते हैं। जहाँ ब्रह्म भी आर्त होकर गह्वर-गलियों में 'राधे, राधे'की पुकार किया करते हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि जिस ब्रह्म को सदा से निरंजन बनने का गर्व था उसे भी किशोरी जी की दासियों ने अपनी आँखों का अंजन बना डाला है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 260-261

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
