# प्रीति सखि नागिनि सी बल खाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0266-M06-K005
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: प्रेम-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 5
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 121–122

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>प्रीति सखि नागिनि सी बल खाय।  
<a id="line-2"></a>दीखत प्रथम अमिय रस-बोरी, पाछे विष बगराय।  
<a id="line-3"></a>प्रथमहिं दीख परत जोइ हाँसी, सोइ फाँसी बनि जाय।  
<a id="line-4"></a>मधुर-मिलन-रस-सुधा माधुरी, पियत सबै बौराय।  
<a id="line-5"></a>पुनि पिय पलक ओट होवत ही, पल पल कलप लखाय।  
<a id="line-6"></a>मरति न जियति “कृपालु” वियोगिनि, तलफति रहति सदाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

हे सखि! प्रीति की गति सर्पिणी के समान अत्यंत टेढ़ी होती है। यह प्रीति प्रथम तो अमृतरस परिप्लुत-सी दिखाई पड़ती है एवं पीछे जहर सा फैलाती हुई अनुभव में आती है। प्रेमिका को पहले मधुर मिलन की अवस्था में जो बात साधारण विनोद सरीखी प्रतीत होती है वही वियोग की अवस्था में प्राण घातक सी बन जाती है। प्रियतम के मधुर-मिलन रूप प्रेमामृत रस माधुरी को पीते हुए तो उस समय सभी प्रेमिकायें आनन्द में विभोर होकर दीवानी-सी बन जाती हैं, किन्तु प्रियतम के पलकों से ओट होते ही विरहिणी के लिये एक-एक पल कल्प के समान प्रतीत होता है। 'कृपालु' कहते हैं कि वह विरहिणी न तो मरती ही है और न जीवित ही रहती है बरन् प्रियतम को मधुर मिलन आकांक्षा में निरन्तर तड़पती रहती है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 364-365

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
