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RADHEY RADHEY

प्रेम-माधुरी · पद 6

प्रेम बिनु ज्ञानी निपट गंमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: prema binu, gyānī nipaṭa gaṁmāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1प्रेम बिनु ज्ञानी निपट गंमार।

2जो नहिं प्रेम-सुधा-रस चाख्यो, सो कस जाननिहार।

3"अँधरेहिं मिली आँखि"को माने? जो न लख्यो संसार।

4तिमि ज्ञानिन दृग मिल्यो लख्यो नहिं, सगुण ब्रह्म साकार।

5कहा सुखी माँ तेहि सुत ते जो, नित रह गर्भ मझार।

6इमि ज्ञानिन नीरस रति रस जो, लख्यो न नित्य विहार।

7हमरे मत “कृपालु” वे ज्ञानी, ज्यों खर चंदन भार॥

हिन्दी भावार्थ

सगुण साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण के निष्काम-प्रेम प्राप्त किये बिना जीवनमुक्त, पूर्णकाम, अमलात्मा ज्ञानी भी रसिकों के सिद्धांत से, ज्ञानी होते हुए भी पूर्णतया अनभिज्ञ हैं। यद्यपि ज्ञानी शब्द का ही अर्थ है जानने वाला, किन्तु प्रेमरस के माधुर्य के आस्वादन के बिना वह ज्ञानी भी पूर्ण रूप से जानने वाला कैसे माना जाय। संसार में भी यदि कोई अंधा यह कहे कि मुझे आँख तो मिल गयी है किन्तु स्थूल पदार्थ कुछ भी नहीं दिखाई पड़ता तब भला उसकी बात को बुद्धिमान जन कैसे मानेंगे। उसी प्रकार यदि कोई ज्ञानी यह कहता है कि मुझे ब्रह्म दर्शन के नेत्र तो मिल गये हैं किन्तु फिर भी सगुण-साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण कभी भी नहीं दिखाई पड़े, तब उस ज्ञानी को रसिक-जन ज्ञानी किस प्रकार मानें। संसार में माता को उस पुत्र से क्या सुख मिल सकता है जो पुत्र सदा ही माता के गर्भ में रहे। उसी प्रकार ज्ञानियों का भी वह ब्रह्मानन्द नीरस है जो सदा अव्यक्त रूप से अंतःकरण में ही रहता है और सगुण साकार पुरुषोत्तम ब्रह्म की नित्य-विहार लीला उनको नहीं दिखाई पड़ती। 'कृपालु' कहते हैं कि हमारे सिद्धांत से तो वह ज्ञानी ठीक उसी प्रकार हैं जैसे चन्दन से लदा हुआ गधा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 365-366