दैन्य-माधुरी · पद 91
सुनो हरि दीनन के रखवार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno hari dīnana ke rakhavāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सुनो हरि दीनन के रखवार।
2चर अरु अचर लक्ष चौरासी, जहँ लगि तव संसार।
3कौने द्वार भीख नहिं माँग्यों, जनमि जनमि बहु बार।
4कासों नहिं रोयो अपनो दुख, प्रति ब्रह्माण्ड मझार।
5तबहूँ प्रभु! मोहिं दीन न मानत, कौन न्याउ उर धार।
6खोजत द्वार तिहारो निशि-दिन, ज्ञानीहूँ गये हार।
7पुनि हम मायाबद्ध जीव किमि, खोजि सकें तव द्वार।
8साधन बिनुहिं “कृपालु” द्रवत तुम, याको करिय विचार॥
हिन्दी भावार्थ
हे दीनों की रक्षा करने वाले दीनबन्धु! मैं कुछ कहता हूँ, ध्यान देकर सुनो। स्थावर जंगम-स्वरूप चौरासी लाख द्वारों का जहाँ तक आपका संसार है, किस द्वार पर जन्म ले-लेकर मैंने अनन्त बार अपने सुख की भीख नहीं माँगी है। प्रत्येक ब्रह्मांड में जा-जाकर किसके आगे अपना दुःखड़ा नहीं रोया। हे प्रभो! इतना होते हुए भी कौन से न्याय के अनुसार तुम मुझे अब भी दीन नहीं मानते। यदि यह कहो कि तुम हमारे द्वार पर क्यों नहीं आये, तो इसका उत्तर यह है कि तुम्हारे द्वार को निरंतर खोजते हुए आज तक अनन्तानन्त ज्ञानीजन भी हार कर थक गये (ज्ञानियों ने तुमको 'अलख', 'अगम'आदि ही बतलाया)। फिर मैं माया-विमोहित जीव तुम्हारा द्वार किस प्रकार खोज सकता हूँ। यदि यह कहो कि भक्ति आदि की साधना के द्वार मेर द्वार को पा सकते हो तो 'कृपालु' कहते हैं कि दीनों के लिये आपका यह नियम है कि साधन के बिना ही पिघल जाते हो, इस नियम का क्या होगा? अतएव मेरे उपरोक्त प्रस्ताव पर विचार कीजिये, मैं उत्तर की प्रतीक्षा में हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 245-246