दैन्य-माधुरी · पद 92
हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamarī ora ṭuka hero rī kishorī rādhe!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमरी ओर टुक हेरो री किशोरी राधे।
2यद्यपि भलीभांति हौं जानत,
3तुम बिनु हितू न मेरो री किशोरी राधे।
4तदपि रसिक जन कही न मानत,
5रहत विषय को चेरो री किशोरी राधे।
6परनिंदा परदोष कथन में,
7चतुर विचित्र चितेरो री किशोरी राधे।
8करत नाम अपराध निरंतर,
9हिय हंकार घनेरो री किशोरी राधे।
10बात बनावत ब्रज रसिकन की,
11मन कामादि बसेरो री किशोरी राधे।
12नाम “कृपालु” काम तुम जानति,
13भलो बुरो जस तेरो री किशोरी राधे॥
हिन्दी भावार्थ
हे वृषभानुनंदिनी राधे! थोड़ा इस अधम की ओर भी अपनी कृपा-कटाक्ष युक्त दृष्टि डालिए। यद्यपि मैं यह बात पूर्ण रूप से जानता हूँ कि तुम्हारे बिना मेरा कोई भी हितैषी नहीं। तुम ही एकमात्र मुझ अगति की गति हो तथापि महापुरुषों के बताये हुए आदेशों का परिपालन नहीं करता वरन् सांसारिक विषयों का दास ही बना रहता हूँ। दूसरों की निन्दा एवं दोषों के प्रकट करने में मैं एक अद्भुत चित्रकार की भाँति अत्यन्त निपुण हूँ। देहाभिमान के कारण अपनी अहंकारपूर्ण बुद्धि से लोकातीत महापुरुषों में भी दोष निकालते हुए, सर्वदा नामापराध स्वरूप अक्षम्य पाप करता रहता हूँ। महापुरुषों में भी सर्वश्रेष्ठ ब्रज रसिकों की सी बातें बघारा करता हूँ, किन्तु हृदय में काम क्रोध, लोभ आदि दोषों को स्थिर रूप से बसाये रहता हूँ। मेरा नाम तो 'कृपालु'(कृपा करने वाला) है किन्तु कार्य तो तुम भली-भाँति जानती ही हो फिर भी अच्छा-बुरा मैं जैसा भी हूँ केवल तुम्हारा ही तो हूँ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 246-247