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RADHEY RADHEY

दैन्य-माधुरी · पद 90

सुनो हरि अधम उधारन हार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: suno hari, adhama-udhārana hāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1सुनो हरि अधम उधारन हार।

2तुम्हरे सब चाकर हैं नागर, गुन आगर सरकार।

3पै इक निगुनी बिनु नहिं शोभा, होति गुनिन दरबार।

4ज्यों न होत मायिक दुख तो तोहिं, को पूछत संसार।

5त्यों न होय जो मो सम निगुनी, हो न गुनिन सत्कार।

6जानत जग “कृपालु” है तुम्हरो, अपनो जानि निहार॥

हिन्दी भावार्थ

हे अधमों को अपजाने वाले श्यामसुन्दर! एक प्रार्थना हमारी भी सुन लो। हे नाथ! तुम्हारे समस्त दास समस्त गुणों के भण्डार एवं रसिक हैं। लेकिन किसी भी दरबार में बिना एक गुणहीन व्यक्ति के गुणी लोगों की शोभा नहीं हैं! जिस प्रकार यदि संसार में मायिक दुःख न होता तो आनन्दस्वरूप तुम को कौन पूछता? उसी प्रकार मुझ सरीखे अवगुण के भण्डार यदि तुम्हारे दरबार में न होंगे तो सर्वगुणसंपन्न तुम्हारे समस्त भक्तों का सम्मान क्या रह जायगा? 'कृपालु' कहते हैं-हे श्यामसुन्दर! भ्रमवश सारा संसार मुझे तुम्हारा भक्त जानता है, तुम भी एक बार अपना जानकर मेरी ओर देख लो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 244-245